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December 20, 2008

" आँखें "

आज मैं आपको अपनी सबसे पहली कविता (जो की मेरे पास लिखित रूप में हैं) पढ़ने के लिए देता हूँ। शायद यह उतनी अच्छी ना हो। वैसे यह मेरी पहली कविता भी नही हैं, क्यूंकि मैंने इसके पहले भी लिखा था। पर, वो अब मेरे पास नहीं हैं। सो, अब यही मेरी पहली कविता हुई।


कह दो उनसे

बंद कर दे उल्टियाँ,

उनका इनपर कोई

असर नही पड़ता।


ये तो पत्थर हैं

पिघल नहीं सकते

क्यों वक़त अपना

ख़राब करती हैं वो?


ये तो बेअसर

जिए जा रहें हैं,

क्यों ख़ुद को सुखा

रहीं हैं आँखें???


कहीं और दिल

लगा ले वो अपना,

ये अपना दिल

देने से रहें।


--- नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित कॉफी होम में लिखी थीं। किसी भिखारी (याची) के लिए संदेश हैं, यह कविता। 19th Aug 2001 को लिखीं।