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October 15, 2012

आजकल का बहुत ही प्रसिद्ध गाना फिल्म "चक्रव्यूह " से आपके किये कुछ चर्चित नए शब्दों के साथ: -
भैया देख लिया है बहुत तेरी सरदारी रे (ओ सरदार रे)
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे ना……

महंगाई की महामारी ने हमारा भट्टा बिठा दिया

चले हटाने गरीबी, गरीबों को हटा दिया
सरबत की तरह देश को
सरबत की तरह देश को गटका है गटागट
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट

भैया देख लिया है बहुत तेरी सरदारी रे (ओ सरदार रे)
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे ना ...
भैया देख लिया है बहुत तेरी सरदारी रे (ओ सरदार रे)
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे ना ...

बिरला (कलमाड़ी) हो या टाटा (सलमान), अम्बानी (राजा) हो या बाटा (वाड्रा)
सबने अपने चक्कर में देस को है काटा

बिरला (कलमाड़ी) हो या टाटा (सलमान), अम्बानी (राजा) हो या बाटा (वाड्रा)
सबने अपने चक्कर में देस को है काटा

अरे हमरे ही खून से इनका
इंजन चले धकधक
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट

अब तो नहीं चलेगी तेरी ये रंगदारी रे
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे न ...
अब तो नहीं चलेगी तेरी ये रंगदारी रे
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे न ...

बजाओ भैया ढोलकी बजाओ डुगडुगी
बजाओ भैया ढोलकी बजाओ डुगडुगी
इनके कोर्ट कचहरी थाने करते झूठ केस पैमाने
इनके बटाईदार कानून करता गाँव गाँव में खून

हलवा समझ के घुस यह खाते हैं गपागप
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट

अब तो नहीं चलेगी तेरी ये थानेदारी रे
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे न ...

घर बेच दो अपना या बेच दो सपना
यह ना डकार लेंगे बस इतना याद रखना
अरे हमरे ही खून से इनका
इंजन चले धकधक
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट
आम आदमी की जेब हो गयी है सफाचट

अब तो नहीं चलेगी तेरी ये रंगदारी रे
अब तो हमरी (आम आदमी) बारी रे न ...

अरे रे ... (ओ सरदार रे...)
नोट : - ऊपर के शब्द सिर्फ शब्द ही हैं किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं।

January 18, 2010

"अबकी जो आना राम"

अबकी जो आना
राम
तो गले में तख्ती डालकर आना
जिसपर लिखा हो -
तुम्ही हो
मर्यादा पुरुषोत्तम
दशरथ नंदन
अयोध्याधिपति
राम
हाँ! वही राम -
जिसने सीता का वरन किया था
वही सीता -
जो जनक नंदिनी
पतिव्रता
मानिनी थी
वरना
किन - किन के सवालों का जवाब दोगें
क्या - क्या सबूत पेश करोगें
ताकि सिद्ध कर सको कि
तुम राम हो?
और
सीता का सिर्फ और सिर्फ तुम्ही से संबंध था और हैं?

--- कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्याविध्यालय में कुछ प्राध्यापकों ने राम और सीता के होने और उनके पवित्र रिश्ते पर ऊँगली उठाई थी| उसकी प्रतिक्रिया हैं ये कविता|

December 14, 2009

"क्या करेगी निगाहें"

कल रात जब खिड़कियों से झाकते चाँद से निगाहें मिली,
तो चाँद ने कहा -
देखता क्या हैं मुझे,
मैंने तो नहीं छोड़ी चांदनी
और मैं मुँह फेर सो गया,
यूँ ही मेरी निगाहों ने दिन के सूरज से निगाहें मिलायी,
तो सूरज घूरते हुए कहने लगा -
कमब्खत को शर्म भी नहीं आती,
मेरी रौशनी को देखता हैं,
और मेरी निगाहों ने यहाँ भी मुझे धोखा ही दिया,
अब डरता हूँ कहीं आईने ने पूछा,
तो क्या करेगी निगाहें…

October 18, 2009

"कुछ राहें"

कुछ राहें
आज भी उधर को ही जाती हैं
कारवां का कारवां
आज भी गुजरता हैं उनसे
बस मैं डरता हूँ
उनतक पहुँचने वाली पगडंडियों से भी
डरूं भी क्यों नहीं
जानता था
और अब मानता भी हूँ
मंजिल पे दिखने वाला
वो धरा - गगन का मिलन
मिलन नहीं
बिछोह का शिलालेख हैं

October 3, 2009

"मैंने -२" ("मैंने सहा हैं")

मैंने सहा हैं
अन्याय को
शरीर के बजाय
आँखों से
अन्याय
जो दूसरों के शरीर पे घांव कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपनी आत्मा पर भी घांव करने दिए हैं|

October 1, 2009

"तुम मेरी हो?"

यूँ ही कुछ वक़त पहले
दिल में ख्याल आया -
तुम मेरी हो
बाकियों की तरह
या उनसे कुछ हटकर
तुम मेरी हो
पर
अब दिमाग की सोच में हैं -
क्या तुम मेरी हो?

September 26, 2009

" हाँ ! मैं भूल गया "

मुझसे पूछते हैं
अक्सर, मुझसे पूछते हैं
तू भूल गया क्या?
सब कुछ
भूल गया ना, तू ?
पर भुला कैसे?
दो घड़ी के लिए
मैं सोचता हूँ
क्या कहूँ, इन्हे ?
फिर कह देता हूँ -
हाँ ! मैं भूल गया
भूल गया, मैं, सब कुछ
पर भुला कैसे ?
ये कभी सोचा ही नहीं

--- सब यही जानते हैं कि मैं भूल गया हूँ सब कुछ| पर भुला या नहीं| ये कोई नहीं जानता, मैं भी नहीं|

January 16, 2009

"कौन - सा प्यार"

तुमने पूछा था
कभी
प्यार किया हैं?
कुछ क्षण के लिए ही सही
प्यार किया हैं?

मैं सोचने लगा
किस प्यार की बात की तुमने
लैला - मंजनू की
या
देवदास - पारों की
या
मीरा -कृष्ण की

खैर छोडों !
तुमने जिस भी प्यार की बात की हों
हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं
राधा - कृष्ण की तरह

--- हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं। सबसे हटकर, एकांत में ख़ुद से। राधा - कृष्ण दो थोड़े ही ना थे (हैं)। 27th June 2003 को लिखीं।

December 21, 2008

"मैंने - १" ("मैंने सुँघा हैं")

मैंने सुँघा हैं

धुएँ को

मुँह की बजाय

नाक से

धुआँ

जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,

उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।


--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।

December 20, 2008

" आँखें "

आज मैं आपको अपनी सबसे पहली कविता (जो की मेरे पास लिखित रूप में हैं) पढ़ने के लिए देता हूँ। शायद यह उतनी अच्छी ना हो। वैसे यह मेरी पहली कविता भी नही हैं, क्यूंकि मैंने इसके पहले भी लिखा था। पर, वो अब मेरे पास नहीं हैं। सो, अब यही मेरी पहली कविता हुई।


कह दो उनसे

बंद कर दे उल्टियाँ,

उनका इनपर कोई

असर नही पड़ता।


ये तो पत्थर हैं

पिघल नहीं सकते

क्यों वक़त अपना

ख़राब करती हैं वो?


ये तो बेअसर

जिए जा रहें हैं,

क्यों ख़ुद को सुखा

रहीं हैं आँखें???


कहीं और दिल

लगा ले वो अपना,

ये अपना दिल

देने से रहें।


--- नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित कॉफी होम में लिखी थीं। किसी भिखारी (याची) के लिए संदेश हैं, यह कविता। 19th Aug 2001 को लिखीं।

May 1, 2008

" धर्मान्तरण "

कल तक उमर था
नाम मेरा
आज से उमेश है

चीख पड़े
धर्म के नुमायिंदे
वो कहते हैं -
मैं उमर नहीं
वो कहते हैं -
मैं उमेश नहीं
उनका रहीम मेरा नहीं
उनका राम मेरा नहीं
अब ना हाथ उठाऊ मैं
अब ना हाथ जोडुँ मैं

मुझसे मेरा विश्वास छीनकर
जीने की चाह छीनकर
वो कहते हैं -
गलती की मैंने
बिना पूछे किया
धर्मान्तरण

पूछता तो
मुझे समझाते
रहीम भक्त के घटने पर
भव्य आयोजन करते
राम भक्त के बढ़ने पर

क्या मेरा विश्वास कुछ नहीं
क्या मेरी ईच्छा कुछ नहीं
तो फिर क्यों
खर्च करते हैं लाखों
धर्मान्तरण के नाम पर

--- पिछले वर्ष भोपाल के उमर ने सिन्धी लड़की से विवाह करने के लिए हिंदू धर्म अपना लिया था। सो, काफी बवाल हुआ था। पता नही अब वह दोनों कैसे हैं ? मैंने बस उन्हें याद करने के लिए यह कविता 6th May 2007 को लिखीं। इसी कविता को मैंने "विस्फोट" पर भी लिखा हैं।

April 23, 2008

" मेरे सर पे छत हैं "

हडबडा कर
उठ बैठता हूँ
रातों में
चाँद देखने के लिए
पर
आजतक नहीं दिखा
क्योंकि
मेरे सर पे छत हैं
आसमाँ नहीं ...

--- जिनके सर पे छत नहीं उनके दुःख - दर्द को छत वाले यानि मैं क्या जानूँ । 17th Nov. 2003 को लिखीं ।

April 18, 2008

" दूर और पास "

सामने बैठे हो
पर ऐसा लगता है
जैसे जानता ही नहीं तुम्हें
पहचानता ही नहीं तुम्हें
दूर कहीं दूर हो तुम मुझसे
और मैं
पास कहीं पास हूँ तुम्हारे

--- 12th May 2005 को लिखीं ।

April 15, 2008

" जिन्दगी या मौत "

जिंदगी ...
क्या हैं ? क्यों हैं? कैसी हैं?
क्या हैं , यह तो मैं नहीं जानता ।
क्यों हैं , यह तो कोई नहीं जानता ।
और रही बात कैसी हैं ,
यह तो सभी जानते हैं ।

यही मौत है ।
क्यों कि,
जिंदगी और मौत
दोनों ही शुरुआत हैं ।
जिंदगी मायावी दुनियाँ की
तो मौत आलौकिक दुनियाँ की ।

कभी - कभी सोचता हूँ
जिंदगी मौत की जन्मदात्री हैं
या
मौत जिंदगी की जन्मदात्री हैं ।
जो भी हो,
पर एक बात तो तय हैं -
दोनों ही इन्तजार बहुत करतीं हैं ।
जिंदगी नौ माह का
तो मौत ...
पूछिये ही मत ...

--- 4th Dec. 1999 को लिखीं ।

April 12, 2008

" रकीब या दिलबर "

तेरी झील-सी आँखों में
उतरा हुआ चाँद
मुझसे पूछता है की
तू मेरा रकीब तो नहीं ?

अब तू ही बता
मैं
उस चाँदनी छोडे चाँद को क्या कहूँ
रकीब या दिलबर ?

--- 22th Sep. 2007 को लिखीं । " किसी " ने कहा कि बहुत-सी कवितायें लिखीं हैं तुमने । पर , मुझ पे कोई कविता नही लिखीं । आज लिख दो । वो कहते हैं ना " जब कोई प्यारा प्यार से कहे तो उसकी बात नहीं टालते " । सो, मैंने भी नहीं टाली