मैंने सुँघा हैं
धुएँ को
मुँह की बजाय
नाक से
धुआँ
जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।
--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।
मन में उबलते बहुत-से अनकहे विचारों में से कुछ, जिन्हें कागज़, कलम और दवात नसीब हुए
मैंने सुँघा हैं
धुएँ को
मुँह की बजाय
नाक से
धुआँ
जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।
--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।
आज मैं आपको अपनी सबसे पहली कविता (जो की मेरे पास लिखित रूप में हैं) पढ़ने के लिए देता हूँ। शायद यह उतनी अच्छी ना हो। वैसे यह मेरी पहली कविता भी नही हैं, क्यूंकि मैंने इसके पहले भी लिखा था। पर, वो अब मेरे पास नहीं हैं। सो, अब यही मेरी पहली कविता हुई।
कह दो उनसे
बंद कर दे उल्टियाँ,
उनका इनपर कोई
असर नही पड़ता।
ये तो पत्थर हैं
पिघल नहीं सकते
क्यों वक़त अपना
ख़राब करती हैं वो?
ये तो बेअसर
जिए जा रहें हैं,
क्यों ख़ुद को सुखा
रहीं हैं आँखें???
कहीं और दिल
लगा ले वो अपना,
ये अपना दिल
देने से रहें।
--- नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित कॉफी होम में लिखी थीं। किसी भिखारी (याची) के लिए संदेश हैं, यह कविता। 19th Aug 2001 को लिखीं।
पिछले बहुत दिनों से मैं यहाँ कुछ लिख नहीं पाया। सच कहु तो दिल में बहुत तम्मना थी की लिखू। पर करता भी क्या, पढ़ाई को लेकर इतना व्यस्त था की समय ही नहीं निकाल पाया। नई जगह और नई पढ़ाई (हाँ, अब मैं SRM Univesity, चेन्नई से M. Tech. (CSE) कर रहा हूँ ।) सो सब कुछ समझ ने में वक़त लगा। और यहाँ नेट की कोई ठीक व्यवस्तता नहीं हैं। कहने को तो रोज शाम में चार बजे के बाद से हमारे कैम्पस में wi-fi on हो जाता हैं। पर वो कम्बखत इतना धीमे चलता हैं, की हम अपना मेल बॉक्स भी नहीं देख पाते हैं। और कुछ करने की बात ही दूर हैं। आज ना जाने कैसे वो ठीक चल रहा हैं। सो, मौका लगते ही मैं यहाँ कुछ लिखने बैठ गया। वैसे, आजकल मेरे पेपर चल रहें हैं।
पहले सोचा की कविता लिखू, पर लगा की क्यों ना दिल की भड़ास पहले निकली जाए। सो, निकाल ली। अब सोचता हूँ की कविता भी लिख ही लू। वरना ना जाने फिर कब यह मौका लगे।
अगर आप सोचते हैं कि आपका काम सबसे कठिन हैं, तो इनके बारे में आपकी क्या राय हैं?

अगर आप सोचते हैं कि आपके बहुत ज्यादा दोस्त नहीं हैं, तो ख़ुद से पूछे कि क्या आपके पास एक अच्छा दोस्त नहीं हैं?
अगर आप सोचते हैं कि आपकी पढ़ाई बोझिल और कठिन हैं, तो इसके बारे में आपकी क्या राय हैं?
जब कभी भी लगे कि जीवन से पीछा छुडा लूँ, तो इनके बारे में सोच के देखें।
अगर आप सोचते हैं कि आपने जीवन को सिर्फ़ झेला हैं, तो इनके बारे में आपकी क्या राय हैं?
अगर आपको आपने देश की यातायात व्यवस्था से शिकायत हैं, तो इनके बारे में आपकी क्या राय हैं?
अगर आप सोचते हैं कि आपका समाज आपके प्रति पक्षपातपूर्ण हैं तो इनके बारे में आपकी क्या राय हैं?