December 21, 2008

"मैंने - १" ("मैंने सुँघा हैं")

मैंने सुँघा हैं

धुएँ को

मुँह की बजाय

नाक से

धुआँ

जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,

उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।


--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।

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