September 7, 2009

"भींगा हुआ इंसान बारिस से क्या डरेगा"

वो कहते हैं ना - "भींगा हुआ इंसान बारिस से क्या डरेगा"| कुछ ऐसा ही आजकल मेरे साथ हो रहा हैं| गम कुछ ज्यादा ही झेल गया हूँ| सो अब फर्क ही नहीं पड़ता कि ज़िन्दगी क्या देती हैं मुझे| जो भी दे; अब तो बस यही गुजारिश हैं कि जल्दी से दे| ताकि मैं भी तो देख सकूँ कि और कितने इम्तिहान बाकि हैं| वैसे सच कहू तो पिछले ग़मों कि गिनती भूल गया हूँ| करता भी क्या, एक के बाद एक दनादन इतने मिलें कि संभालना मुश्किल हो गया था, गिनता कहाँ से| कभी कभी तो सोचने लगा था कि क्यूँ मैं ही क्यूँ? पर अब ये सवाल भी नहीं करता ख़ुद से| आदत सी जो हो गई हैं| अब तो लगता हैं मैं ही, बस मैं ही हूँ - जिसे गम देने में ज़िन्दगी को मजा आता हैं| सो उस बेचारी से उसका मजा क्यों छीन लूँ| कोई तो हैं जिसके काम आ रहा हूँ|

खैर छोडिये, उन बातों को| "ये जीवन हैं, इस जीवन का, यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं हैं रंग रूप"| हा हा हा हा.... मेरा गाना नहीं हैं, चुराया हैं| रात बहुत हो चुकी हैं - 2:30 के करीब| सो, अब सो जाते हैं| फिर मिलेगें| मैं, आप और मेरी वो| तब ढेर सारी बातें करेगे| अब ये "वो" कौन हैं अगली बार बताउगा|

शुभ रात्रि....

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