August 29, 2009
दूसरा जनम
पर अब सोच रहा हूँ, की क्या करू, कहाँ से दूसरी शुरुआत करू| अब तक पिछली यादो ने ही पीछा नही छोड़ा हैं| ढूंड रहा हूँ की कैसे पीछा छुटाऊ| और कभी-कभी तो सोचता हूँ कि छुटाऊ ही क्यों? पता नहीं पिछले कुछ दिनों से क्या हो रहा है, मेरे साथ|
खैर छोडिये इस सब बातों को| अब आया हूँ तो कुछ न कुछ तो जरुर ही करुगा| वैसे मैं अपने दोस्तों और उनसे पहले उस उपरवाले को धन्यवाद करुगा, जिन्हों ने मुझे दूसरा जनम दिया हैं|
August 22, 2009
हमारी नज़रों में

अपनी आवाज़ सुनाकर हाले दिल बयान करो,
हम तो कबसे आँखें बिछाए खड़े हैं,
बस रहते हैं हम आप ही के ख्यालों में,
कभी ख़ुद को महसूस करो हमारी नज़रों में !
August 19, 2009
गोल्डन लिज़र्ड टेम्पल
अभी हाल ही में मैं और मेरे दोस्त कांचीपुरम (तमिलनाडु) गए थे| ये हमारे कॉलेज से ज्यादा दूर नही हैं| बल्कि हमारा कॉलेज ही चेन्नई में ना आ कर इसी जिले में आता हैं| वहां बहुत से मन्दिर हैं जिनका अपना - अपना महत्व हैं| इन सब में एक खास तरह का मन्दिर हैं, जिसे गोल्डन लिज़र्ड टेम्पल कहते हैं| नाम से ही लगता हैं ना की यह सोने की छिपकलियाँ का मन्दिर होगा| मैं भी इसी भ्रम में गया था| पर ऐसा कुछ भी नही हैं| यह एक बहुत बड़ा और प्राचीन मन्दिर हैं| और यहाँ छिपकली के नाम पर सिर्फ़ दो ही छिपकलियाँ हैं - एक चांदी और एक पीतल की| इन दोनों के साथ ही पीतल के बने चाँद - सूरज भी हैं| यह सब एक साथ एक लकड़ी के पट्टे पर लगे हुए हैं| और वो पट्टा छत से लगा हुआ हैं|
जैसा की आप यहाँ देख हैं| कहते हैं की अगर आपको जीवन में कभी भी छिपकली ने छुआ हैं, तो इन दोनों छिपकलियों को छूने उसका अपशगुन कट जाता हैं| अबकी बार जब घर जाउगां तो माँ से कहूगा की मैंने तो आपने अपशगुन कट लिए हैं, माँ| वैसे मैं आप से पूछता हूँ, आप कब आ रहे हैं अपने अपशगुन दूर करने के लिए कांचीपुरम| बहुत ही खुबसूरत शहर हैं| और मन्दिर तो पुछियें ही नहीं, ना जाने कितने हैं| और सब एक से बढ़कर एक|
August 15, 2009
ढाई आखर का प्यार...
"प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता। प्यार तो अपने आप हो जाता है। दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं। सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार... कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं, तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं। प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है। प्यार पर किसी का वश नहीं होता.... अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ... दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार... जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको उसके नजदीक होने का अहसास होने लगता है , हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं, कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो... यही तो होता है प्यार... सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास। पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं। यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है। केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं ...... "
पढ़ने में कुछ अजीब सी बातें लग रही हैं, ना| शायद आप सोचे की ये किस तरह की बातें कर रहा हूँ, मैं| कहते हैं ना, "अपने किसी खास को खोने का एहसास आपको छन भर के लिए ही सही पर पागल कर देता हैं"| शायद मेरे साथ भी यही हुआ| तभी तो पागलों जैसी बातें कर रहा हूँ| हाँ ! प्यार की बातें करने वाले पागल ही तो होते हैं| ऐसा आप ही लोगों ने कहा हैं| पर मुझे नहीं लगता की मेरे द्वारा उपर लिखी बातों से किसी को भी कोई आपत्ति होगी| और जहाँ तक मेरा मानना हैं, आप सब भी इसे सही ही मानते होगें| वैसे मेरे या आपके मानने या ना मानने से क्या होता हैं, सत्य तो सत्य ही रहेगा|
January 16, 2009
"कौन - सा प्यार"
कभी
प्यार किया हैं?
कुछ क्षण के लिए ही सही
प्यार किया हैं?
मैं सोचने लगा
किस प्यार की बात की तुमने
लैला - मंजनू की
या
देवदास - पारों की
या
मीरा -कृष्ण की
खैर छोडों !
तुमने जिस भी प्यार की बात की हों
हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं
राधा - कृष्ण की तरह
--- हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं। सबसे हटकर, एकांत में ख़ुद से। राधा - कृष्ण दो थोड़े ही ना थे (हैं)। 27th June 2003 को लिखीं।
December 21, 2008
"मैंने - १" ("मैंने सुँघा हैं")
मैंने सुँघा हैं
धुएँ को
मुँह की बजाय
नाक से
धुआँ
जो दूसरों के फेफडों की सैर कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपने फेफडों की सैर करवाई हैं।
--- इस कविता को मैंने ख़ुद के लिए लिखा हैं। 10th May 2008 को लिखीं।
December 20, 2008
" आँखें "
आज मैं आपको अपनी सबसे पहली कविता (जो की मेरे पास लिखित रूप में हैं) पढ़ने के लिए देता हूँ। शायद यह उतनी अच्छी ना हो। वैसे यह मेरी पहली कविता भी नही हैं, क्यूंकि मैंने इसके पहले भी लिखा था। पर, वो अब मेरे पास नहीं हैं। सो, अब यही मेरी पहली कविता हुई।
कह दो उनसे
बंद कर दे उल्टियाँ,
उनका इनपर कोई
असर नही पड़ता।
ये तो पत्थर हैं
पिघल नहीं सकते
क्यों वक़त अपना
ख़राब करती हैं वो?
ये तो बेअसर
जिए जा रहें हैं,
क्यों ख़ुद को सुखा
रहीं हैं आँखें???
कहीं और दिल
लगा ले वो अपना,
ये अपना दिल
देने से रहें।
--- नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित कॉफी होम में लिखी थीं। किसी भिखारी (याची) के लिए संदेश हैं, यह कविता। 19th Aug 2001 को लिखीं।
" माफ़ी चाहिए मुझे "
पिछले बहुत दिनों से मैं यहाँ कुछ लिख नहीं पाया। सच कहु तो दिल में बहुत तम्मना थी की लिखू। पर करता भी क्या, पढ़ाई को लेकर इतना व्यस्त था की समय ही नहीं निकाल पाया। नई जगह और नई पढ़ाई (हाँ, अब मैं SRM Univesity, चेन्नई से M. Tech. (CSE) कर रहा हूँ ।) सो सब कुछ समझ ने में वक़त लगा। और यहाँ नेट की कोई ठीक व्यवस्तता नहीं हैं। कहने को तो रोज शाम में चार बजे के बाद से हमारे कैम्पस में wi-fi on हो जाता हैं। पर वो कम्बखत इतना धीमे चलता हैं, की हम अपना मेल बॉक्स भी नहीं देख पाते हैं। और कुछ करने की बात ही दूर हैं। आज ना जाने कैसे वो ठीक चल रहा हैं। सो, मौका लगते ही मैं यहाँ कुछ लिखने बैठ गया। वैसे, आजकल मेरे पेपर चल रहें हैं।
पहले सोचा की कविता लिखू, पर लगा की क्यों ना दिल की भड़ास पहले निकली जाए। सो, निकाल ली। अब सोचता हूँ की कविता भी लिख ही लू। वरना ना जाने फिर कब यह मौका लगे।
June 25, 2008
सकारात्मक कवितायें
हो सकता हैं कि मैंने जीवन की खूबसूरती को अब तक समझा ही नहीं हो। पर, समझू भी तो कैसे कोई समझाने वाला तो हो। जो कोई भी समझाने आने वाला होता हैं , किसी - ना - किसी बहाने से उसे मुझ से छीन लिया जाता है। अब इसमें मेरी गलती तो हैं नहीं, कि मैंने उन्हें जाने दिया या खो दिया। वो कहते हैं ना कि उपरवाले के आगे किसी की नहीं चलती। मुझे नहीं पता किसी की चलती हैं या नहीं। पर, आज तक मेरी नहीं चली, और मैं चलाना भी नहीं चाहता। क्यूंकि जानता हूँ कि इसमें मेरे ही नुक्सान हैं। और, वैसे भी नुक्सान का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता।
खैर छोड़े इन बातों को। हाँ तो मैं कह रहा था कि कविता मेरे लिए भाव कि प्रस्तुति हैं। सच में भाव ही तो हैं जो जीवन जीने की ताकत देते हैं, कम से कम मुझे तो देते ही हैं। बाकियों का मुझे पता नही। भाव अगर ना हो तो कविता बिन जल की मीन के जैसी ही तो हैं। कुछ लोग शायद इसे शब्दों का व्यवस्तित संजोग मानते हैं, तभी तो उनकी कविताओं में भाव नहीं होते। पता नहीं, मेरी कविताओं में भाव होते हैं या नहीं। पर, मेरी पुरी कोशिश रहती हैं कि मेरी कविताओं में भाव हो।
वैसे उन दोस्तों को जिनकी मुझ से शिकायत थी, उनको मैं सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूँ की मैं कोशिश करूँगा की उनकी वाली सकारात्मक कवितायें भी लिख सकूँ।
May 1, 2008
" धर्मान्तरण "
नाम मेरा
आज से उमेश है
चीख पड़े
धर्म के नुमायिंदे
वो कहते हैं -
मैं उमर नहीं
वो कहते हैं -
मैं उमेश नहीं
उनका रहीम मेरा नहीं
उनका राम मेरा नहीं
अब ना हाथ उठाऊ मैं
अब ना हाथ जोडुँ मैं
मुझसे मेरा विश्वास छीनकर
जीने की चाह छीनकर
वो कहते हैं -
गलती की मैंने
बिना पूछे किया
धर्मान्तरण
पूछता तो
मुझे समझाते
रहीम भक्त के घटने पर
भव्य आयोजन करते
राम भक्त के बढ़ने पर
क्या मेरा विश्वास कुछ नहीं
क्या मेरी ईच्छा कुछ नहीं
तो फिर क्यों
खर्च करते हैं लाखों
धर्मान्तरण के नाम पर
--- पिछले वर्ष भोपाल के उमर ने सिन्धी लड़की से विवाह करने के लिए हिंदू धर्म अपना लिया था। सो, काफी बवाल हुआ था। पता नही अब वह दोनों कैसे हैं ? मैंने बस उन्हें याद करने के लिए यह कविता 6th May 2007 को लिखीं। इसी कविता को मैंने "विस्फोट" पर भी लिखा हैं।
