तो चाँद ने कहा -
देखता क्या हैं मुझे,
और मैं मुँह फेर सो
यूँ ही मेरी निगाहों ने दिन के सूरज से निगाहें मिलायी,
तो सूरज घूरते हुए कहने लगा -
कमब्खत को शर्म भी नहीं आती,
मेरी रौशनी को देखता हैं,
और मेरी निगाहों ने यहाँ भी मुझे धोखा ही दिया,
अब डरता हूँ कहीं आईने ने पूछा,
तो क्या करेगी निगाहें…

1 comment:
its really superb. nice dude.
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