October 18, 2009

"कुछ राहें"

कुछ राहें
आज भी उधर को ही जाती हैं
कारवां का कारवां
आज भी गुजरता हैं उनसे
बस मैं डरता हूँ
उनतक पहुँचने वाली पगडंडियों से भी
डरूं भी क्यों नहीं
जानता था
और अब मानता भी हूँ
मंजिल पे दिखने वाला
वो धरा - गगन का मिलन
मिलन नहीं
बिछोह का शिलालेख हैं

1 comment:

Asha Joglekar said...

वो धरा - गगन का मिलन
मिलन नहीं
बिछोह का शिलालेख हैं
बेहद सुंदर ।