मैंने सहा हैं
अन्याय को
शरीर के बजाय
आँखों से
अन्याय
जो दूसरों के शरीर पे घांव कर चुका होता हैं,
उसे मैंने अपनी आत्मा पर भी घांव करने दिए हैं|
October 3, 2009
October 1, 2009
"तुम मेरी हो?"
यूँ ही कुछ वक़त पहले
दिल में ख्याल आया -
तुम मेरी हो
बाकियों की तरह
या उनसे कुछ हटकर
तुम मेरी हो
पर
अब दिमाग की सोच में हैं -
क्या तुम मेरी हो?
दिल में ख्याल आया -
तुम मेरी हो
बाकियों की तरह
या उनसे कुछ हटकर
तुम मेरी हो
पर
अब दिमाग की सोच में हैं -
क्या तुम मेरी हो?
September 28, 2009
मायने रखते हैं
कौन - सी चीज़ इंसान को इंसान बनती हैं ? एक बार मेरे दोस्त ने ऐसा ही कुछ पूछा था| क्या वो जन्म से ही ऐसा हैं या फिर उसकी परवरिस उसे ऐसा बनते हैं? मैंने कहा, " ये सब बातें मायने नहीं रखती हैं| मायने रखते हैं, उसके फैसले| वो काम जैसे भी शुरु करें, पर वो काम कैसे खत्म करता हैं| वो मायने रखता हैं| "
September 26, 2009
" हाँ ! मैं भूल गया "
मुझसे पूछते हैं
अक्सर, मुझसे पूछते हैं
तू भूल गया क्या?
सब कुछ
भूल गया ना, तू ?
पर भुला कैसे?
दो घड़ी के लिए
मैं सोचता हूँ
क्या कहूँ, इन्हे ?
फिर कह देता हूँ -
हाँ ! मैं भूल गया
भूल गया, मैं, सब कुछ
पर भुला कैसे ?
ये कभी सोचा ही नहीं
--- सब यही जानते हैं कि मैं भूल गया हूँ सब कुछ| पर भुला या नहीं| ये कोई नहीं जानता, मैं भी नहीं|
अक्सर, मुझसे पूछते हैं
तू भूल गया क्या?
सब कुछ
भूल गया ना, तू ?
पर भुला कैसे?
दो घड़ी के लिए
मैं सोचता हूँ
क्या कहूँ, इन्हे ?
फिर कह देता हूँ -
हाँ ! मैं भूल गया
भूल गया, मैं, सब कुछ
पर भुला कैसे ?
ये कभी सोचा ही नहीं
--- सब यही जानते हैं कि मैं भूल गया हूँ सब कुछ| पर भुला या नहीं| ये कोई नहीं जानता, मैं भी नहीं|
September 7, 2009
"भींगा हुआ इंसान बारिस से क्या डरेगा"
वो कहते हैं ना - "भींगा हुआ इंसान बारिस से क्या डरेगा"| कुछ ऐसा ही आजकल मेरे साथ हो रहा हैं| गम कुछ ज्यादा ही झेल गया हूँ| सो अब फर्क ही नहीं पड़ता कि ज़िन्दगी क्या देती हैं मुझे| जो भी दे; अब तो बस यही गुजारिश हैं कि जल्दी से दे| ताकि मैं भी तो देख सकूँ कि और कितने इम्तिहान बाकि हैं| वैसे सच कहू तो पिछले ग़मों कि गिनती भूल गया हूँ| करता भी क्या, एक के बाद एक दनादन इतने मिलें कि संभालना मुश्किल हो गया था, गिनता कहाँ से| कभी कभी तो सोचने लगा था कि क्यूँ मैं ही क्यूँ? पर अब ये सवाल भी नहीं करता ख़ुद से| आदत सी जो हो गई हैं| अब तो लगता हैं मैं ही, बस मैं ही हूँ - जिसे गम देने में ज़िन्दगी को मजा आता हैं| सो उस बेचारी से उसका मजा क्यों छीन लूँ| कोई तो हैं जिसके काम आ रहा हूँ|
खैर छोडिये, उन बातों को| "ये जीवन हैं, इस जीवन का, यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं हैं रंग रूप"| हा हा हा हा.... मेरा गाना नहीं हैं, चुराया हैं| रात बहुत हो चुकी हैं - 2:30 के करीब| सो, अब सो जाते हैं| फिर मिलेगें| मैं, आप और मेरी वो| तब ढेर सारी बातें करेगे| अब ये "वो" कौन हैं अगली बार बताउगा|
शुभ रात्रि....
खैर छोडिये, उन बातों को| "ये जीवन हैं, इस जीवन का, यहीं हैं, यहीं हैं, यहीं हैं रंग रूप"| हा हा हा हा.... मेरा गाना नहीं हैं, चुराया हैं| रात बहुत हो चुकी हैं - 2:30 के करीब| सो, अब सो जाते हैं| फिर मिलेगें| मैं, आप और मेरी वो| तब ढेर सारी बातें करेगे| अब ये "वो" कौन हैं अगली बार बताउगा|
शुभ रात्रि....
August 29, 2009
दूसरा जनम
ना जाने क्यों पिछले कुछ दिनों से ज़िन्दगी बोझ सी लगने लगी थी| सोचा क्यों ना इस बोझ को कम ही कर दिया जाए| सो मरने की सोची| सोची क्या यूँ कहिये कोशिश की| पर कम्बखत मौत ने भी साथ ना दिया| जानते हैं मुझ से कहती हैं, "तुझे तो अभी बहुत से काम करने हैं, और वैसे भी तेरी जरुरत उपरवाले को नही हैं| सो कुछ दिन और झेल ले इस ज़िन्दगी को| फिर ख़ुद आ कर तुझे ले जाऊगी| " तक़रीबन दो दिन सोचने के बाद मैंने भी निर्णय ले ही लिया| और वापस ज़िन्दगी से दोस्ती कर के लौट आया|
पर अब सोच रहा हूँ, की क्या करू, कहाँ से दूसरी शुरुआत करू| अब तक पिछली यादो ने ही पीछा नही छोड़ा हैं| ढूंड रहा हूँ की कैसे पीछा छुटाऊ| और कभी-कभी तो सोचता हूँ कि छुटाऊ ही क्यों? पता नहीं पिछले कुछ दिनों से क्या हो रहा है, मेरे साथ|
खैर छोडिये इस सब बातों को| अब आया हूँ तो कुछ न कुछ तो जरुर ही करुगा| वैसे मैं अपने दोस्तों और उनसे पहले उस उपरवाले को धन्यवाद करुगा, जिन्हों ने मुझे दूसरा जनम दिया हैं|
पर अब सोच रहा हूँ, की क्या करू, कहाँ से दूसरी शुरुआत करू| अब तक पिछली यादो ने ही पीछा नही छोड़ा हैं| ढूंड रहा हूँ की कैसे पीछा छुटाऊ| और कभी-कभी तो सोचता हूँ कि छुटाऊ ही क्यों? पता नहीं पिछले कुछ दिनों से क्या हो रहा है, मेरे साथ|
खैर छोडिये इस सब बातों को| अब आया हूँ तो कुछ न कुछ तो जरुर ही करुगा| वैसे मैं अपने दोस्तों और उनसे पहले उस उपरवाले को धन्यवाद करुगा, जिन्हों ने मुझे दूसरा जनम दिया हैं|
August 22, 2009
हमारी नज़रों में

कभी तो वक्त की अहमियत को समझा करो,
अपनी आवाज़ सुनाकर हाले दिल बयान करो,
हम तो कबसे आँखें बिछाए खड़े हैं,
बस रहते हैं हम आप ही के ख्यालों में,
कभी ख़ुद को महसूस करो हमारी नज़रों में !
अपनी आवाज़ सुनाकर हाले दिल बयान करो,
हम तो कबसे आँखें बिछाए खड़े हैं,
बस रहते हैं हम आप ही के ख्यालों में,
कभी ख़ुद को महसूस करो हमारी नज़रों में !
August 19, 2009
गोल्डन लिज़र्ड टेम्पल
बचपन में एक बार मेरे शरीर के किसी अंग पर छिपकली गिर गई| जानते हैं क्या हुआ| माँ ने कहा "यह अपशगुन होता हैं| जा कर नहा के आ"| और मुझे उस कपकपाती ठंढ में नहाना पड़ा| गुस्सा तो बहुत आया उस छिपकली, पर मैं कर भी क्या सकता था| यह बात मुझे आज भी याद हैं|
अभी हाल ही में मैं और मेरे दोस्त कांचीपुरम (तमिलनाडु) गए थे| ये हमारे कॉलेज से ज्यादा दूर नही हैं| बल्कि हमारा कॉलेज ही चेन्नई में ना आ कर इसी जिले में आता हैं| वहां बहुत से मन्दिर हैं जिनका अपना - अपना महत्व हैं| इन सब में एक खास तरह का मन्दिर हैं, जिसे गोल्डन लिज़र्ड टेम्पल कहते हैं| नाम से ही लगता हैं ना की यह सोने की छिपकलियाँ का मन्दिर होगा| मैं भी इसी भ्रम में गया था| पर ऐसा कुछ भी नही हैं| यह एक बहुत बड़ा और प्राचीन मन्दिर हैं| और यहाँ छिपकली के नाम पर सिर्फ़ दो ही छिपकलियाँ हैं - एक चांदी और एक पीतल की| इन दोनों के साथ ही पीतल के बने चाँद - सूरज भी हैं| यह सब एक साथ एक लकड़ी के पट्टे पर लगे हुए हैं| और वो पट्टा छत से लगा हुआ हैं|
जैसा की आप यहाँ देख हैं| कहते हैं की अगर आपको जीवन में कभी भी छिपकली ने छुआ हैं, तो इन दोनों छिपकलियों को छूने उसका अपशगुन कट जाता हैं| अबकी बार जब घर जाउगां तो माँ से कहूगा की मैंने तो आपने अपशगुन कट लिए हैं, माँ| वैसे मैं आप से पूछता हूँ, आप कब आ रहे हैं अपने अपशगुन दूर करने के लिए कांचीपुरम| बहुत ही खुबसूरत शहर हैं| और मन्दिर तो पुछियें ही नहीं, ना जाने कितने हैं| और सब एक से बढ़कर एक|
अभी हाल ही में मैं और मेरे दोस्त कांचीपुरम (तमिलनाडु) गए थे| ये हमारे कॉलेज से ज्यादा दूर नही हैं| बल्कि हमारा कॉलेज ही चेन्नई में ना आ कर इसी जिले में आता हैं| वहां बहुत से मन्दिर हैं जिनका अपना - अपना महत्व हैं| इन सब में एक खास तरह का मन्दिर हैं, जिसे गोल्डन लिज़र्ड टेम्पल कहते हैं| नाम से ही लगता हैं ना की यह सोने की छिपकलियाँ का मन्दिर होगा| मैं भी इसी भ्रम में गया था| पर ऐसा कुछ भी नही हैं| यह एक बहुत बड़ा और प्राचीन मन्दिर हैं| और यहाँ छिपकली के नाम पर सिर्फ़ दो ही छिपकलियाँ हैं - एक चांदी और एक पीतल की| इन दोनों के साथ ही पीतल के बने चाँद - सूरज भी हैं| यह सब एक साथ एक लकड़ी के पट्टे पर लगे हुए हैं| और वो पट्टा छत से लगा हुआ हैं|
जैसा की आप यहाँ देख हैं| कहते हैं की अगर आपको जीवन में कभी भी छिपकली ने छुआ हैं, तो इन दोनों छिपकलियों को छूने उसका अपशगुन कट जाता हैं| अबकी बार जब घर जाउगां तो माँ से कहूगा की मैंने तो आपने अपशगुन कट लिए हैं, माँ| वैसे मैं आप से पूछता हूँ, आप कब आ रहे हैं अपने अपशगुन दूर करने के लिए कांचीपुरम| बहुत ही खुबसूरत शहर हैं| और मन्दिर तो पुछियें ही नहीं, ना जाने कितने हैं| और सब एक से बढ़कर एक|
August 15, 2009
ढाई आखर का प्यार...
आज बहुत दिनों के बाद मन में उबलते विचारों को कीपैड से मेल करा पा रहा हूँ। ये कहीं ना कहीं मेरे दिल में खुलबुलाते संवेदनायो की ही परछाई हैं: -
"प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता। प्यार तो अपने आप हो जाता है। दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं। सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार... कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं, तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं। प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है। प्यार पर किसी का वश नहीं होता.... अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ... दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार... जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको उसके नजदीक होने का अहसास होने लगता है , हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं, कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो... यही तो होता है प्यार... सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास। पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं। यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है। केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं ...... "
पढ़ने में कुछ अजीब सी बातें लग रही हैं, ना| शायद आप सोचे की ये किस तरह की बातें कर रहा हूँ, मैं| कहते हैं ना, "अपने किसी खास को खोने का एहसास आपको छन भर के लिए ही सही पर पागल कर देता हैं"| शायद मेरे साथ भी यही हुआ| तभी तो पागलों जैसी बातें कर रहा हूँ| हाँ ! प्यार की बातें करने वाले पागल ही तो होते हैं| ऐसा आप ही लोगों ने कहा हैं| पर मुझे नहीं लगता की मेरे द्वारा उपर लिखी बातों से किसी को भी कोई आपत्ति होगी| और जहाँ तक मेरा मानना हैं, आप सब भी इसे सही ही मानते होगें| वैसे मेरे या आपके मानने या ना मानने से क्या होता हैं, सत्य तो सत्य ही रहेगा|
"प्यार को कभी भी किया नहीं जा सकता। प्यार तो अपने आप हो जाता है। दिन और रात... धरती और आसमान, एक दूसरे के बिना सब अधूरे हैं। सन -सन करती हवाएं, सुन्दर नजारे, फूलों की खुशबू ... सभी में छिपा होता है प्यार... कुछ तो प्यार में हारकर भी जीत जाते हैं, तो कुछ जीतकर भी अपना प्यार हार जाते हैं। प्यार एक ऐसा नशा है जिसमें जो डूबता है वो ही पार होता है। प्यार पर किसी का वश नहीं होता.... अगर आप भी प्यार महसूस करना चाहते हैं तो डूबिये किसी के प्यार में ... दुनिया की सबसे बड़ी नेमत है ढाई आखर का प्यार... जब आप भी किसी को चाहने लगते हैं तो उसके दूर होने पर भी आपको उसके नजदीक होने का अहसास होने लगता है , हर चेहरे में आप उसका चेहरा ढूंढने की असफल कोशिश करते हैं, कोई पल ऐसा न गुजरता होगा जब उसका नाम आपके होठों पर न रहता हो... यही तो होता है प्यार... सुन्दर, सुखद , निश्छल और पवित्र अहसास। पूरी दुनिया के सुख इस प्रेम में समाए हुए हैं। यह शब्द छोटा होते हुए भी सभी शब्दों में बड़ा महसूस होता है। केवल इतना सा अहसास मात्र ही आपको तरंगित कर देगा कि मैं उससे प्यार करता या करती हूं ...... "
पढ़ने में कुछ अजीब सी बातें लग रही हैं, ना| शायद आप सोचे की ये किस तरह की बातें कर रहा हूँ, मैं| कहते हैं ना, "अपने किसी खास को खोने का एहसास आपको छन भर के लिए ही सही पर पागल कर देता हैं"| शायद मेरे साथ भी यही हुआ| तभी तो पागलों जैसी बातें कर रहा हूँ| हाँ ! प्यार की बातें करने वाले पागल ही तो होते हैं| ऐसा आप ही लोगों ने कहा हैं| पर मुझे नहीं लगता की मेरे द्वारा उपर लिखी बातों से किसी को भी कोई आपत्ति होगी| और जहाँ तक मेरा मानना हैं, आप सब भी इसे सही ही मानते होगें| वैसे मेरे या आपके मानने या ना मानने से क्या होता हैं, सत्य तो सत्य ही रहेगा|
January 16, 2009
"कौन - सा प्यार"
तुमने पूछा था
कभी
प्यार किया हैं?
कुछ क्षण के लिए ही सही
प्यार किया हैं?
मैं सोचने लगा
किस प्यार की बात की तुमने
लैला - मंजनू की
या
देवदास - पारों की
या
मीरा -कृष्ण की
खैर छोडों !
तुमने जिस भी प्यार की बात की हों
हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं
राधा - कृष्ण की तरह
--- हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं। सबसे हटकर, एकांत में ख़ुद से। राधा - कृष्ण दो थोड़े ही ना थे (हैं)। 27th June 2003 को लिखीं।
कभी
प्यार किया हैं?
कुछ क्षण के लिए ही सही
प्यार किया हैं?
मैं सोचने लगा
किस प्यार की बात की तुमने
लैला - मंजनू की
या
देवदास - पारों की
या
मीरा -कृष्ण की
खैर छोडों !
तुमने जिस भी प्यार की बात की हों
हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं
राधा - कृष्ण की तरह
--- हाँ ! मैंने भी प्यार किया हैं। सबसे हटकर, एकांत में ख़ुद से। राधा - कृष्ण दो थोड़े ही ना थे (हैं)। 27th June 2003 को लिखीं।
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