हडबडा कर
उठ बैठता हूँ
रातों में
चाँद देखने के लिए
पर
आजतक नहीं दिखा
क्योंकि
मेरे सर पे छत हैं
आसमाँ नहीं ...
--- जिनके सर पे छत नहीं उनके दुःख - दर्द को छत वाले यानि मैं क्या जानूँ । 17th Nov. 2003 को लिखीं ।
April 23, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment